प्रेम?
यह घटना कभी घटी ही नहीं,
बस सुबह उठते ही
बनाती हूँ एक कप चाय अपने लिये
और एक कप तुम्हारे लिये भी,
इन दोनों का एक साथ बनना
हर सुबह घुल जाता है
जीवन में प्रेम की तरह .
प्रेम एक घटना है या जीवन ?
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।