नदी का बहना मुझमे हो
मेरी कोशिश है कि
नदी का बहना मुझमें हो।
तट से सटे कछार घने हों
जगह जगह पर घाट बने हों
टीलों पर मंदिर हों जिनमें
स्वर के विविध वितान तने हों
मीड़ मूर्च्छनाओं का
उठना गिरना मुझमें हो।
जो भी प्यास पकड़ ले कगरी
भर ले जाये खाली गगरी
छूकर तीर उदास न लौटें
हिरन कि गाय बाघ या बकरी
मच्छ मगर घडियाल
सभी का रहना मुझमें हो।
मैं न रुकूँ संग्रह के घर मे
धार रहे मेरे तेवर में
मेरा बदन काट कर नहरे
पानी ले जायें ऊसर मे
जहाँ कहीं हो बंजरपन का
मरना मुझमें हो।
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शिव बहादुर सिंह भदौरिया
मीड़: संगीत में एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाना। मूर्छना: सात स्वरों का आरोह अवरोह। कगरी: ऊँचा किनारा, ओंठ। ऊसर: नोनी भूमि, जहाँ अन्न उत्पन्न नहीं होता है
काव्यालय पर प्रकाशित: 18 Jan 2018
इस महीने :
'राम की जल समाधि'
भारत भूषण
पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।
किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
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इस महीने :
'रंग'
गीता दूबे
तुम्हारे पास बहुत से रंग हैं
दोस्ती, प्यार, इकरार,
उम्मीदों और खुशियों के।
सपनों का तो रंग-बिरंगा
चंदोवा ही तान दिया है तुमने।
निश्छल मुस्कान का ...
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