अप्रतिम कविताएँ

पंथ होने दो अपरिचित
पंथ होने दो अपरिचित
प्राण रहने दो अकेला!

और होंगे चरण हारे,                 
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;
दुखव्रती निर्माण-उन्मद
यह अमरता नापते पद;
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!

दूसरी होगी कहानी                 
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;
आज जिसपर प्रलय विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला!

हास का मधु-दूत भेजो,                 
रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;
ले मिलेगा उर अचंचल
वेदना-जल स्वप्न-शतदल,
जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला!
- महादेवी वर्मा
काव्यपाठ: शरद तिवारी
सम्पादकीय: पहले "आज जिसपर प्रलय विस्मित" ग़लती से "आज जिसपर प्यार विस्मित" लिखा था। वही ग़लती ऑडियो में रह गई है। पंक्ति महादेवी वर्मा की आत्मिका देख कर सुधारी गई है।
विषय:
संकल्प (16)

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..

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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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