पंथ होने दो अपरिचित
पंथ होने दो अपरिचित
प्राण रहने दो अकेला!

और होंगे चरण हारे,                 
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;
दुखव्रती निर्माण-उन्मद
यह अमरता नापते पद;
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!

दूसरी होगी कहानी                 
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;
आज जिसपर प्रलय विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला!

हास का मधु-दूत भेजो,                 
रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;
ले मिलेगा उर अचंचल
वेदना-जल स्वप्न-शतदल,
जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला!
- महादेवी वर्मा
काव्यपाठ: शरद तिवारी
सम्पादकीय: पहले "आज जिसपर प्रलय विस्मित" ग़लती से "आज जिसपर प्यार विस्मित" लिखा था। वही ग़लती ऑडियो में रह गई है। पंक्ति महादेवी वर्मा की आत्मिका देख कर सुधारी गई है।

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महादेवी वर्मा
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 कौन तुम मेरे हृदय में
 जो तुम आ जाते एक बार
 तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
 पंथ होने दो अपरिचित
 प्रिय चिरन्तन है सजनि
 मेरे दीपक
इस महीने :
'चल पथिक तू हौले से'
प्रिया एन. अइयर


टहल रहा गर भोर से पहले
पग तू रखना धीरे से
जगे हुए हैं जीव-जंतु
मानव तुमसे पहले से

खरगोश, कीट और खग निकले
नीड़, बिल, कुंड से खुल के
चंचल अबोध छौने संग
चली हिरन निर्भयता  से

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
चलो समय के साथ चलेंगे,
परिवर्तन होगा धरती पर।
नया ज़माना पैदा होगा,
बूढ़ी दुनिया की अर्थी पर।

जो कुछ हम पर बीत चुकी है,
उस से मुक्त रहो, ओ नवयुग।
नए नए फूलों से महको,
मेरे मधुवन, जीयो जुग जुग।

~ विनोद तिवारी की कविता "मेरे मधुवन" का अंश संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

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