अप्रतिम कविताएँ
गले मिलते रंग

आह्लाद में डूबे रंग खिलखिला रहे हैं

इतने रंग हैं
कि फूल भी चुरा रहे हैं रंग
आज तितलियों के लिए

गले मिल रहे हैं रंग

जब मिलता है गले एक रंग
दूसरे रंग से
बदल जाता है उसका रंग
कुछ पहले से
जैसे कुछ बदल जाता है आदमी
दूसरे आदमी से मिलने के बाद

कितने रंग हैं जीवन के
क्या फ़र्क़ कर सकते हो तुम
गुलाल और रुधिर की लालिमा में

निकल आए हैं घोंसले से बाहर लोग
आसमान होता जा रहा है लाल

एक नाटा लड़का अचानक
फेंकता है उचक कर रंग का गुब्बारा
भीग जाती है इरफ़ान चचा की दाढ़ी
इरफ़ान चचा खिलखिला रहे हैं
खिलखिला रहे हैं उनकी दाढ़ी के बाल
रंगों की बारिश हो रही है
और टपक रहा है रंग
मेरी आत्मा के भीतर

हवा में गूँज रहा है
सिर्फ़ एक शब्द बार-बार
प्यार प्यार प्यार

और प्यार
लाज से छिपा रहा है
अपने रंगे हुए गाल
- विनोद दास
काव्यपाठ: प्रकाश देवकुलिश
विषय:
प्रेम (63)
होली (9)
समाज (33)
रंग (3)

काव्यालय को प्राप्त: 26 Mar 2025. काव्यालय पर प्रकाशित: 13 Feb 2026

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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