कौन तुम मेरे हृदय में
       कौन तुम मेरे हृदय में?

कौन मेरी कसक में नित
       मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में
       घुमड़ घिर झरता अपरिचित?
       स्वर्ण स्वप्नों का चितेरा
              नींद के सूने निलय में!
                     कौन तुम मेरे हृदय में?

अनुसरण निश्वास मेरे
       कर रहे किसका निरन्तर?
चूमने पदचिन्ह किसके
       लौटते यह श्वास फिर फिर?
       कौन बन्दी कर मुझे अब
              बँध गया अपनी विजय मे?
                     कौन तुम मेरे हृदय में?

एक करुण अभाव चिर -
       तृप्ति का संसार संचित,
एक लघु क्षण दे रहा
       निर्वाण के वरदान शत-शत;
       पा लिया मैंने किसे इस
              वेदना के मधुर क्रय में?
                     कौन तुम मेरे हृदय में?

गूंजता उर में न जाने
       दूर के संगीत-सा क्या!
आज खो निज को मुझे
       खोया मिला विपरीत-सा क्या!
       क्या नहा आई विरह-निशि
              मिलन-मधदिन के उदय में?
                     कौन तुम मेरे हृदय में?

तिमिर-पारावार में
       आलोक-प्रतिमा है अकम्पित;
आज ज्वाला से बरसता
       क्यों मधुर घनसार सुरभित?
       सुन रही हूँ एक ही
              झंकार जीवन में, प्रलय में?
                     कौन तुम मेरे हृदय में?

मूक सुख-दुख कर रहे
       मेरा नया श्रृंगार-सा क्या?
झूम गर्वित स्वर्ग देता -
       नत धरा को प्यार-सा क्या?
       आज पुलकित सृष्टि क्या
              करने चली अभिसार लय में?
                     कौन तुम मेरे हृदय में?
- महादेवी वर्मा

***
महादेवी वर्मा
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 कौन तुम मेरे हृदय में
 जो तुम आ जाते एक बार
 तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
 पंथ होने दो अपरिचित
 प्रिय चिरन्तन है सजनि
 मेरे दीपक
इस महीने :
'पेड़'
जोएस किलमर


मैं शायद कभी न देखूँगा,
एक पेड़ सी सुन्दर कविता।

पेड़, जिसके वह भूखे होंठ,
वसुधा स्तन-धारा पे हैं लोट।

पेड़, जिसका रुख ईश्वर ओर,
पल्लवित भुजाएं विनय विभोर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'चल पथिक तू हौले से'
प्रिया एन. अइयर


टहल रहा गर भोर से पहले
पग तू रखना धीरे से
जगे हुए हैं जीव-जंतु
मानव तुमसे पहले से

खरगोश, कीट और खग निकले
नीड़, बिल, कुंड से खुल के
चंचल अबोध छौने संग
चली हिरन निर्भयता  से

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
चलो समय के साथ चलेंगे,
परिवर्तन होगा धरती पर।
नया ज़माना पैदा होगा,
बूढ़ी दुनिया की अर्थी पर।

जो कुछ हम पर बीत चुकी है,
उस से मुक्त रहो, ओ नवयुग।
नए नए फूलों से महको,
मेरे मधुवन, जीयो जुग जुग।

~ विनोद तिवारी की कविता "मेरे मधुवन" का अंश संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website