सुन सुलक्षणा
प्रभु की किरपा -
सुन सुलक्षणा
इस अंतिम बेला में तुम हो संग हमारे

बर्फ़-हुई इस देह धरे के ताप संग हैं हमने भोगे
पुरे हमारे सारे सपने जो थे हमने, सजनी, जोगे

हिरदय अक्सर
गीत हुआ था
दिन कोमल गांधार रहे थे संग तुम्हारे

आदिम छुवन पर्व की यादें हमको रह-रह टेर रही हैं
यौवन की मीठी फुहार को थकी झुर्रियाँ हेर रही हैं

कामदेव के
मंत्र हो गये
बोल सभी वे जो थे हमनें संग उचारे

पतझर हुईं हमारी साँसें, भीतर फिर भी रितु फागुन की
रास हो रहा है यह दिन भी - गूँज आ रही वंशीधुन की

नदीघाट पर
कहीं बज रही
है शहनाई - महाकाल का पर्व गुहारे
- कुमार रवीन्द्र

काव्यालय पर प्रकाशित: 25 Jan 2019

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कुमार रवीन्द्र
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 अभी होने दो समय को
 काश हम पगडंडियाँ होते
 तैर रहा इतिहास नदी में
 बक्सों में यादें
 मित्र सहेजो
 सुन सुलक्षणा
इस महीने :
'अघट घटती जा रही है'
जया प्रसाद


ये ज़िन्दगी बेचैन कुछ लम्हों में कटती जा रही है
निरंतर अस्थिर अनिश्चित अघट घटती जा रही है।

किसी रोज़ उड़ चली, बदरंग मौसम में कभी
किसी रोज़ बह चली, पानी के कलकल में कभी
जैसे जैसे बिखरती वैसे सिमटती जा रही है
निरंतर अस्थिर अनिश्चित अघट घटती जा रही है।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तस्वीर की लडकी बोलती है'
प्रत्यक्षा


जिस रात
अँधेरा गहराता है
चाँदनी पिघलती है
मैं हौले कदमों से
कैनवस की कैद से
बाहर निकलती हूँ

बालों को झटक कर खोलती हूँ
और उन घनेरी ज़ुल्फों में
टाँकती हूँ जगमगाते सितारे
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
युगों युगों से भटक रहा है
मेरा शाश्वत एकाकीपन।
धीरे धीरे उठा रहा हूँ
अपनी पीड़ा का अवगुंठन।

~ विनोद तिवारी


संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

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