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काश हम पगडंडियाँ होते
यों न होते
काश !
हम पगडंडियाँ होते
इधर जंगल - उधर जंगल
बीच में हम साँस लेते
नदी जब होती अकेली
उसे भी हम साथ देते
कभी उसकी
देह छूते
कभी अपने पाँव धोते
कोई परबतिया
इधर से जब गुज़रती
घुघरुओं की झनक
भीतर तक उतरती
हम
उसी झंकार को
आदिम गुफाओं में सँजोते
और-भी पगडंडियों से
उमग कर हम गले मिलते
तितलियों के संग उड़ते
कोंपलों के संग खिलते
देखते हम
कहाँ जाती है गिलहरी
कहाँ बसते रात तोते
-
कुमार रवीन्द्र
विषय:
प्रकृति (41)
सहजता (8)
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काश हम पगडंडियाँ होते
तैर रहा इतिहास नदी में
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मित्र सहेजो
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इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।
ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!
तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार
स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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