मित्र सहेजो

मित्र सहेजो
हम जंगल से धूप-छाँव लेकर आये हैं

पगडण्डी पर वे बैठी थीं पाँव पसारे
पेड़ों ने थे फगुनाहट के बोल उचारे

उन्हें याद थे
ऋषियों ने जो मंत्र सूर्यकुल के गाये हैं

वनकन्या की हँसी - नेह उसके हिरदय का
उन्हें सँजोओ - छँट जायेगा धुंध समय का

इन्हें न टेरो
घिरे शहर में धुएँ-धुंध के जो साये हैं

आधी रातों के निर्णय हैं सभागार में
टँगी हुईं सूरज की छवियाँ राजद्वार में

उन्हें दिशा दो
जो शाहों के संवादों से भरमाये है
- कुमार रवीन्द्र

काव्यालय को प्राप्त: 16 Jan 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 11 Jan 2019

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कुमार रवीन्द्र
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 अभी होने दो समय को
 काश हम पगडंडियाँ होते
 तैर रहा इतिहास नदी में
 बक्सों में यादें
 मित्र सहेजो
 सुन सुलक्षणा
इस महीने :
'गेंद और सूरज'
नूपुर अशोक


बच्चों की एक दुनिया है,
जिसमें एक गेंद है
और एक सूरज भी है।
सूरज के ढलते ही
रुक जाता है उनका खेल
और तब भी
जब गेंद चली जाती है
अंकल की छत पर।

अंकल की दुनिया में है
टीवी और अखबार
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इस महीने :
'गुल्लू'
प्रदीप शुक्ला


'गुल्लू-मुल्लू', 'पारू बच्चा'
नाम एक से एक है अच्छा
'गौरी', 'गुल्लू', 'छोटा माँऊँ'
गिनते जाओ नाम सुनाऊँ
'गुल्ला रानी' बड़ी सयानी
दादी कहतीं सबकी नानी
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इस महीने :

'कौआ'
जया प्रसाद


घर के बाहर कौआ बैठा काँव-काँव चिल्लाता है।
कौन है आने वाला इसकी खबरें कौआ लाता है।

पापा की मौसी के घर से गुड़ की भेली आनी हो,
उस दिन सुबह सवेरे उठता जैसे बुढ़िया नानी हो,
चीख-चीख कर घर वालों को कौआ राग सुनाता है।
उस दिन सबसे पहले क्यों, मुझको नहीं जगाता है ?

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इस महीने :
'लॉकडाउन और मैं'
टुषी भट्टाचार्य


गज़ब वो दिन थे, मैदानों पर होते थे जब सारे खेल;
अब तो घर में बैठे हैं बस, सर में खूब लगाकर तेल।
पुस्तकें सारी पढ़ डाली हैं, रंग डाले हैं सारे चित्र,
धमाचौकड़ी करें भी कैसे, अब जो घर न आते मित्र।
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