परिवर्तन जिए
अनहोनी बातों की
आशा में जीना
कितना रोमांचकारी है

मैं उसी की आशा में
जी रहा हूँ
सोच रहा हूँ
हवा की ही नहीं
सूर्य किरनों की गति
मेरी कविता में आएंगी
मेरी वाणी
उन तूफ़ानों को गाएंगी
जो अभी उठे नहीं है
और जिन्हें उठना है
इसलिए कि
जड़ता नहीं
परिवर्तन जिए

बच्चे का भय
और बच्चे का कौतूहल
मेरी आंखों और
शब्दों से फूटे
तो टूटे
सामने खड़ा पहाड़
तयशुदा पक्की चाट्टानों का

कचूमर निकले
इसके टूटने से
मेरे तुम्हारे उसके
प्राणों का
तो एक अनहोनी हो जाए
मरते-मरते
जीने का मतलब निकले
फिसले-फिसले-फिसले
यह पहाड़ सामने का
काला
और तयशुदा

देखें हम
यह एक करिश्मा
साथ-साथ
और जुदा-जुदा!
- भवानीप्रसाद मिश्र
भवानीप्रसाद मिश्र के काव्य संकलन परिवर्तन जिए से

काव्यालय पर प्रकाशित: 21 Jun 2019

***
भवानीप्रसाद मिश्र
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अच्छा अनुभव
 आराम से भाई जिन्दगी
 कुछ नहीं हिला उस दिन
 चिकने लम्बे केश
 जबड़े जीभ और दाँत
 परिवर्तन जिए
 विस्मृति की लहरें
 सतपुड़ा के घने जंगल
इस महीने
'गीत कोई कसमसाता'
अनीता निहलानी


नील नभ के पार कोई
मंद स्वर में गुनगुनाता,
रूह की गहराइयों में
गीत कोई कसमसाता!

निर्झरों सा कब बहेगा
संग ख़ुशबू के उड़ेगा,
जंगलों का मौन नीरव
बारिशों की धुन भरेगा!

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'सुप्रभात'
प्रभाकर शुक्ला


नयन का नयन से, नमन हो रहा है
लो उषा का आगमन हो रहा है
परत पर परत, चांदनी कट रही है
तभी तो निशा का, गमन हो रहा है
क्षितिज पर अभी भी हैं, अलसाये सपने
पलक खोल कर भी, शयन हो रहा है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 26 जुलाई को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website