अप्रतिम कविताएँ
जबड़े जीभ और दाँत
जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
और हाथ पाँव और अँगुलियाँ और नाक
और आँख और आँख की पुतलियाँ
तुम्हारा सब-कुछ जाँचकर देख लिया गया है
और तुम जँच नहीं रहे हो
लोगों को लगता है
जीवन जितना
नचाना चाहता है तुम्हें
तुम उतने नच नहीं रहे हो

जीवन किसी भी तरह का इशारा दे
और नाचे नहीं आदमी उस पर तो यह
आदमी की कमी मानी जाती है इसलिए
जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
तमाम चीज़ों को इस लायक बनाना है
वे इसीलिए जाँची जा रही हैं
और तुम्हें डालकर रखा गया है बिस्तरे पर

यह सब तुम्हारे भले कि लिए है
इस तरह तुम नाचने में समर्थ बनाए जाओगे
यानी जब घर आओगे अस्पताल से
तब सब नाचेंगे कि तुम
हो गए नाचने लायक!
- भवानीप्रसाद मिश्र
साहित्य अकादेमी पुरस्कृत संकलन "बुनी हुई रस्सी" से

एमज़ोन पर उपलब्ध
विषय:
बुढ़ापा बीमारी (9)

काव्यालय पर प्रकाशित: 10 May 2019

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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