Toggle navigation
English Interface
संग्रह से कोई भी रचना
काव्य विभाग
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
मुक्तक
प्रतिध्वनि
काव्य लेख
सहयोग दें
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
पावन कर दो
आ पवस्व मन्दितम पवित्रं धारया कवे ।
अर्कस्य योनिमासदम् ।।
(ऋ. 9/50/4)
कवि! मेरा मन पावन कर दो!
हे! रसधार
बहाने वाले,
हे! आनन्द
लुटाने वाले,
ज्योतिपुंज मैं भी हो जाऊँ
ऐसा अपना तेज प्रखर दो!
- अज्ञात
- अनुवाद :
अमृत खरे
पुस्तक
"मयूरपंख: गीत संग्रह (अमृत खरे)"
और
'श्रुतिछंदा'
से
विषय:
विस्तार (13)
कवि (6)
कविता का गतिरूप
देखने यहाँ क्लिक करें
×
अज्ञात
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ
अविद्या और विद्या
उऋण रहें
कौन
त्र्यम्बक प्रभु को भजें
नया वर्ष
पावन कर दो
मंगलम्
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'
आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'देश की नागरिक'
वाणी मुरारका
आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
क्या गढ़ूँगी?
कौन से देश की नागरिक बनूँगी?
सवाल खुद से करती हूँ|
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।
ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!
तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना
| काव्य विभाग:
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
|
प्रतिध्वनि
|
काव्य लेख
सम्पर्क करें
|
हमारा परिचय
सहयोग दें