अप्रतिम कविताएँ

मंगलम्
भूमि मंगलम् (भूमि मंगलम्)
उदक मंगलम् (उदक मंगलम्)
अग्नि मंगलम् (अग्नि मंगलम्)
वायु मंगलम् (वायु मंगलम्)
गगन मंगलम् (गगन मंगलम्)
सूर्य मंगलम् (सूर्य मंगलम्)
चन्द्र मंगलम् (चन्द्र मंगलम्)
जगत मंगलम् (जगत मंगलम्)
जीव मंगलम् (जीव मंगलम्)
देह मंगलम् (देह मंगलम्)
मनो मंगलम् (मनो मंगलम्)
आत्म मंगलम् (आत्म मंगलम्)
सर्व मंगलम् भवतु भवतु भवतु
सर्व मंगलम् भवतु भवतु भवतु
सर्व मंगलम् भवतु भवतु भवतु।

- अज्ञात
उदक : पानी; भवतु : ऐसा हो
सितार वादक पंडित रवि शंकर के एल्बम Chants of India से
विषय:
विस्तार (13)

काव्यालय पर प्रकाशित: 27 Dec 2019

***
अज्ञात
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अविद्या और विद्या
 उऋण रहें
 कौन
 त्र्यम्बक प्रभु को भजें
 नया वर्ष
 पावन कर दो
 मंगलम्
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :

'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website