अप्रतिम कविताएँ
कौन
कः स्विदेकाकी चरति कऽउ स्विज्जायते पुनः ।
किं स्विद्धिमस्य भेषजं किम्वावपनं महत् ।।
सूर्य्यऽ एकाकी चरति चन्द्रमा जायते पुनः ।
अग्निर्हिमस्य भेषजं भूमिरावपनं महत् ।।
(यजु. 23/45 व 46)
कौन एकाकी विचरता?
कौन फिर-फिर जन्मता है?
शीत की औषधि भला क्या ?
बीज-रोपण के लिये, बोलो,
वृहत आधार क्या है?

सूर्य एकाकी विचरता,
चन्द्र फिर-फिर जन्मता है,
शीत की है अग्नि औषधि,
बीज-रोपण के लिये, देखो,
वृहत उर्वर धरा है !
- अज्ञात
- अनुवाद : अमृत खरे
रोपण -- लगाना; वृहत -- विशाल; उर्वर -- उपजाऊ
पुस्तक 'श्रुतिछंदा' से
विषय:
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय को प्राप्त: 25 Sep 2023. काव्यालय पर प्रकाशित: 24 Nov 2023

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अज्ञात
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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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