गहरा आँगन
इस पल का यह गहरा आँगन
इसमें तू स्पन्दित है साजन।
नयनालोकित स्मृतियों से हैं
मन भरपूर प्रीत से पावन।
दूषित विश्व पवन हो पावन
जग को अर्पित यह प्रेमाँगन।
तनहाई जो मन पर छाए -
तू मनमीत हमेशा साजन।
नयनालोकित: नयन + आलोकित: रोशनी से भरी आँखें
काव्यालय को प्राप्त: 29 Nov 2014.
काव्यालय पर प्रकाशित: 5 Apr 2018
इस महीने :
'गुनाह का गीत'
धर्मवीर भारती
अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों'
शान्ति मेहरोत्रा
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;
तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!
मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
..
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भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।
प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते
हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...
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