अप्रतिम कविताएँ
गहरा आँगन
इस पल का यह गहरा आँगन
इसमें तू स्पन्दित है साजन।
नयनालोकित स्मृतियों से हैं
मन भरपूर प्रीत से पावन।

दूषित विश्व पवन हो पावन
जग को अर्पित यह प्रेमाँगन।
तनहाई जो मन पर छाए -
तू मनमीत हमेशा साजन।
- वाणी मुरारका
नयनालोकित: नयन + आलोकित: रोशनी से भरी आँखें
Vani Murarka
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विषय:
प्रेम (63)

काव्यालय को प्राप्त: 29 Nov 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 5 Apr 2018

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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
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कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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