गहरा आँगन
इस पल का यह गहरा आँगन
इसमें तू स्पन्दित है साजन।
नयनालोकित स्मृतियों से हैं
मन भरपूर प्रीत से पावन।

दूषित विश्व पवन हो पावन
जग को अर्पित यह प्रेमाँगन।
तनहाई जो मन मंडराए -
तू मनमीत हमेशा साजन।
- वाणी मुरारका
नयनालोकित: नयन + आलोकित: रोशनी से भरी आँखें
Vani Murarka
[email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 29 Nov 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 5 Apr 2018

***
वाणी मुरारका
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अधूरी साधना
 गहरा आँगन
 चुप सी लगी है
 जल कर दे
इस महीने
'आराम से भाई जिन्दगी'
भवानीप्रसाद मिश्र


आराम से भाई जिन्दगी
जरा आराम से

तेजी तुम्हारे प्यार की बर्दाश्त नहीं होती अब
इतना कसकर किया गया आलींगन
जरा ज़्यादा है जर्जर इस शरीर को

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'चिकने लम्बे केश'
भवानीप्रसाद मिश्र


चिकने लम्बे केश
काली चमकीली आँखें
खिलते हुए फूल के जैसा रंग शरीर का
फूलों ही जैसी सुगन्ध शरीर की
समयों के अन्तराल चीरती हूई
अधीरता इच्छा की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'जबड़े जीभ और दाँत'
भवानीप्रसाद मिश्र


जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
और हाथ पाँव और अँगुलियाँ और नाक
और आँख और आँख की पुतलियाँ
तुम्हारा सब-कुछ जाँचकर देख लिया गया है
और तुम जँच नहीं रहे हो
लोगों को लगता है
जीवन जितना
नचाना चाहता है तुम्हें
तुम उतने नच नहीं रहे हो

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'कुछ नहीं हिला उस दिन'
भवानीप्रसाद मिश्र


कुछ नहीं हिला उस दिन
न पल न प्रहर न दिन न रात

सब निक्ष्चल खड़े रहे
ताकते हूए अस्पताल के परदे
और दरवाजे और खिड़कीयाँ
और आती-जाती लड़कियाँ
जिन्हे मैं सिस्टर नहीं कहना चाहता था
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 7 जून को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website