अप्रतिम कविताएँ
देश की नागरिक
आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
क्या गढ़ूँगी?
कौन से देश की नागरिक बनूँगी?
सवाल खुद से करती हूँ|
जिस देश में जन्म हुआ,
जिस देश की मैं बेटी हूँ,
वह द्वेष का पर्याय नहीं,
संकल्प फिर से करती हूँ|

कुछ संज्ञा विशेष में सिमटी
धर्म की परिभाषाएँ,
गत पीड़ा की फिर से उठती
धुंध की पिपासाएँ --
इनसे परे बना यह देश|
राजा प्रजा काल जो भी
कर लें, यह देश
रहेगा कायम

दुशाला ओढ़ किसी भी
संज्ञा विशेष का,
अथवा तज कर,
जैसे भी तू आना चाहे,
स्वागत तेरा करती हूँ,
देश ऐसा गढ़ती हूँ|
- वाणी मुरारका
Vani Murarka
[email protected]
विषय:
संकल्प (16)
देशप्रेम (13)
समाज (33)

काव्यालय को प्राप्त: 17 Dec 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 17 Dec 2019

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..

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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