अप्रतिम कविताएँ पाने
धीरे-धीरे
एहसासों की लड़ी है
ये ज़िन्दगी।
धीरे-धीरे आगे बढ़ती हूँ ―
एक एक एहसास को
सहेज कर,
समेट कर,
रखती हूँ।
वक्त लगता है।

कमरा बिखरा रह जाता है।
- वाणी मुरारका
Vani Murarka
[email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 22 Dec 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 9 Dec 2022

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'मेरा अपना चाँद'
सुशोभित


चीड़ में अटका चाँद
बूँद बूँद टपका रहता है
औंधा लटका चाँद।

दुनियाभर में इसके डेरे
पखवाड़े पखवाड़े फेरे
अबकी घर मेरे रुक जाए
रस्ता भटका चाँद।

सँझा से सँवलाई छाया
बरखा में बिसराई माया
देखो कितना दु:ख सहता है
मेरा अपना चाँद।

जी करता है गले लगा लूँ
कोट के अंदर कहीं छुपा लूँ
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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हरिवंशराय बच्चन


नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में छा गया सहसा अँधेरा,
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रात-सा दिन हो गया, फिर रात आ‌ई और काली,
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रात के उत्पात-भय से भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर-फिर! ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'जीवन की करो गिनती'
प्रकाश देवकुलिश


इससे पहले कि अँधेरा पोत दे काला रंग
सफेद रोशनी पर
फैला जो है उजास
उसकी बातें करो
अँधेरे की बूँद को समुद्र मत बनाओ

इससे पहले कि मृत्यु अपने को बदल दे शोर में

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
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