सुकूने-दिल
तरस जाती हैं सुनने को
                 किसी की...

न जाने कब किसी से
           क्यूँ कहा हमने
सुकूने-दिल की बातें हैं
वो यादें तुम्हारी
           कि तुम्हारे दिल
           में होगी कभी
           चर्चा हमारी भी
- रणजीत मुरारका

काव्यालय को प्राप्त: 27 Mar 2020. काव्यालय पर प्रकाशित: 24 Jul 2020

***
रणजीत मुरारका
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 उद्गार
 कल
 फसाना
 रिश्ते तूफां से
 सुकूने-दिल
इस महीने :

'काव्यालय के आँकड़े - जुलाई 2019 से जून 2020'


काव्यालय की गतिविधि का वार्षिक रिपोर्ट, जुलाई 2019 से जून 2020 का संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार है ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
बेकली महसूस हो तो गुनगुना कर देखिये।
दर्द जब हद से बढ़े तब मुस्कुरा कर देखिये।

रोशनी आने को एक दिन खुद-ब-खुद आ जायेगी
आज तो तारीक़ियों को ही जला कर देखिये।

~ विनोद तिवारी


संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से
अब मुद्रित (प्रिंटेड) संस्करण भी उपलब्ध

संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website