अप्रतिम कविताएँ
उद्गार
रात के तीसरे पहर
कोयल की कूक ने हमको जगाया,
और कहा,
नए उषाकाल का
नए रंग, नयी चुनर का
आहवान करो !
किस मोड़ पर आकर रुक गए हो?
यादों की चादर ओढ़े
नयी तमन्ना, नयी उमंग,
कहानी नयी है।
किसी ने कहा बसंत आ गया,
किसी ने
बसंत आता नहीं ले आया जाता है।
हमने महसूस किया
यह वो तरंग है जो बहती है रगों में
निरंतर, रंगीन, नित नूतन।
- रणजीत मुरारका
Ranjeet Murarka
Email : [email protected]

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होलोकॉस्ट में एक कविता
~ प्रियदर्शन

लेकिन इस कंकाल सी लड़की के भीतर एक कविता बची हुई थी-- मनुष्य के विवेक पर आस्था रखने वाली एक कविता। वह देख रही थी कि अमेरिकी सैनिक वहाँ पहुँच रहे हैं। इनमें सबसे आगे कर्ट क्लाइन था। उसने उससे पूछा कि वह जर्मन या अंग्रेजी कुछ बोल सकती है? गर्डा बताती है कि वह 'ज्यू' है। कर्ट क्लाइन बताता है कि वह भी 'ज्यू' है। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा यह बात हैरानी में डालती है कि इसके बाद गर्डा जर्मन कवि गेटे (Goethe) की कविता 'डिवाइन' की एक पंक्ति बोलती है...

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राष्ट्र वसन्त
रामदयाल पाण्डेय

पिकी पुकारती रही, पुकारते धरा-गगन;
मगर कहीं रुके नहीं वसन्त के चपल चरण।

असंख्य काँपते नयन लिये विपिन हुआ विकल;
असंख्य बाहु हैं विकल, कि प्राण हैं रहे मचल;
असंख्य कंठ खोलकर 'कुहू कुहू' पुकारती;
वियोगिनी वसन्त की...

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