अप्रतिम कविताएँ
फसाना
रहो अपने दिल में
उड़ो आसमां तक
ज़मीं से आसमां तक
तेरा फसाना होगा

न जाने क्यूँ
न उड़ता हूँ मैं
न रहता हूँ दिल में
फिर भी
हसरत है कि
फसाना बन जाऊँ

फसाने बहुत हुए
सदियों से
कुछ तुफां
से आये
और बिखर गये
कुछ हलचलें
दिखातीं हैं
सतहों पर
न जाने किस
दबे तुफां की
तसवीर हैं ये

दिलों, आसमां औ जमीं
की तारीख
इन फसानों
में सिमटी
बिखरी है

कुछ बनने की
ख्वाहिश
कुछ गढ़ने
की ज़रूरत

मैं एक फसाना हूँ
एक कशिश
एक धड़कन
हूँ दिल की

जिसकी आवाज
सदियों से
चंद फसानों में
निरंतर
कल कल
नदी के नाद
सी
थिरकती आयी
है।
- रणजीत मुरारका
Ranjeet Murarka
Email : [email protected]
विषय:
अन्तर्मन (14)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

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