अप्रतिम कविताएँ
रिश्ते तूफां से
हमने तूफां अपना, खुद चुना है
साहिल न हो, पतवार न हो, तो क्या।

हम ही तूफां हैं, साहिल हैं,
पतवार हम हैं।
यह क्या कम है कि,
मौजे रवां हम हैं
तूफां हम हैं पतवार हम हैं।

वर्ष दो वर्ष, जिन्दगी एक नये मोड़ पर
घूम जाती है
वो कैसे लोग हैं कि सीधी सड़क पर
चले जा रहें हैं
हमने हर मोड़ पर
एक नया तर्न्नुम पाया -
संगीत जिन्दगी का
गाते चले।

तुम दूर चले जाओगे, तो क्या
तुम याद आओगे, तो क्या
तुम भूल जाओगे, तो क्या
जिन्दगी यही याद, भूल, आसरा है

नये रिश्तों में, तूफां मे चलो नहीं
किसी नाव को तूफां में ठेलो नहीं
कोई तूफां कोई रिश्ते
बहती रेत में नहीं उठते बनते

ऐसे तूफां के सपने संजोओ नहीं
जिसकी इक लहर का दूसरी से
कोई रिश्ता न हो

न जाने कितने संग ओ साथी
के बाद
एकाकी जीवन पाया है।
एक समय था कि
साथ छॊड़ जाते थे हम
अब है कि नये साथ खोजते हैं।

हमने सोचा था कि जीवन एकाकी है
न जाने कब किसने
नये साथ की आहट दी है।

यह आहट सुनों नहीं
इस साथ में भटको नहीं
साथ अपने एकाकीपन का
संगीत अपनी रुह का
गाते चलो निभाते चलो।

इकतारे को औरों की हवा से
न छेड़ो
इसका संगीत नायाब है
अनमोल है
इसे नये रिश्तों से, न जोड़ो।
- रणजीत मुरारका
विषय:
संकल्प (15)
एकान्त (3)

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
रणजीत मुरारका
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 उद्गार
 कल
 फसाना
 रिश्ते तूफां से
 सुकूने-दिल
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'देश की नागरिक'
वाणी मुरारका


आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
क्या गढ़ूँगी?
कौन से देश की नागरिक बनूँगी?
सवाल खुद से करती हूँ|
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website