Raat Hemant Kee
kaaminee see ab lipaT kar so gayee hai
raat yah hemant kee
deep-tan ban ooShm karane
sej apane kant kee

nayan laalim sneh deepit
bhuj milan tan-gandh surabhit
us nukeele vakSh kee
vah chhuvan, ukasan, chubhan alasit

is agaru-sudhi se salonee ho gayee hai
raat yah hemant kee
kaaminee see ab lipaT kar so gayee hai
raat yah hemant kee

dhoop chandan rekh see
salmaa-sitaaraa saa(n)jh hogee
chaa(n)danee hogee n tapasini
din banaa hogaa n yogee

jab kalee ke khule angon par lagegee
rang chhaap vasant kee
kaaminee see ab lipaT kar so gayee hai
raat yah hemant kee
- Girijakumar Mathur
गिरिजा कुमार माथुर का काव्य संग्रह मुझे और अभी कहना है से
हेमन्त : सर्दी की एक ऋतु (हिम, बर्फ से); ऊष्म : गरम; सेज : बिस्तर; कन्त : पति; अगरु : एक सुगंधित वृक्ष अगर की लकड़ी;

प्रकाशित: 21 Dec 2018

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Girijakumar Mathur
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'भावुकता और पवित्रता'
रवीन्द्रनाथ ठाकुर


भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से, भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।

प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा बन जाती है। मनुष्य अन्यान्य रस-लाभ के लिए जिस तरह विविध प्रकार के आयोजन करता है, लोगों को नियुक्त करता है, रुपया खर्च करता है उसी तरह उपासना-रस के नशे के लिए भी वह तरह-तरह के आयोजन करता है। रसोद्रेक के लिए उचित लोगों का संग्रह करके उचित रूप से वक्तृताओं की व्यवस्था की जाती है। भगवत्प्रेम का रस नियमित रूप से मिलता रहे, इस विचार से तरह-तरह की दुकानें खोली जाती है। ..

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