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Geet Koyee Kasamasaataa
neel nabh ke paar koee
mand svar men gunagunaataa,
rooh kee gaharaaiyon men
geet koee kasamasaataa!

nirjharon saa kab bahegaa
sang Khushaboo ke uḌegaa,
jangalon kaa maun neerav
baarishon kee dhun bharegaa!

karavaTen le shabd jaage
aahaTen sun nikal bhaage,
haar aakhar kaa banaa jo
bune kisane raag taage!

goo(n)jataa hai har dishaa men
bhor nirmal shubh nishaa men,
Ter detee dhenuon men
jhoomatee pachhuaa havaa men!

lauTate ghar hans gaate
dhaar dariyaa ke sunaate,
pavan kee saragoshiyaa(n) sun
paat paadap sarasaraate!

geet hai amaraavatee kaa
ghaagharaa au' taaptee kaa,
kanTh kokil men chhupaa hai
preet kee ik raaginee kaa!
- Anita Nihalani
आखर - अक्षर; पछुआ - पश्चिम दिशा से आती पवन; पात - पत्ते; पादप - पौधे; अमरावती - देवभूमि; घाघरा और ताप्ती - दो नदियों के नाम

काव्यालय को प्राप्त: 26 Jun 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 19 Jul 2019

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Anita Nihalani
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होलोकॉस्ट में एक कविता
~ प्रियदर्शन

लेकिन इस कंकाल सी लड़की के भीतर एक कविता बची हुई थी-- मनुष्य के विवेक पर आस्था रखने वाली एक कविता। वह देख रही थी कि अमेरिकी सैनिक वहाँ पहुँच रहे हैं। इनमें सबसे आगे कर्ट क्लाइन था। उसने उससे पूछा कि वह जर्मन या अंग्रेजी कुछ बोल सकती है? गर्डा बताती है कि वह 'ज्यू' है। कर्ट क्लाइन बताता है कि वह भी 'ज्यू' है। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा यह बात हैरानी में डालती है कि इसके बाद गर्डा जर्मन कवि गेटे (Goethe) की कविता 'डिवाइन' की एक पंक्ति बोलती है...

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राष्ट्र वसन्त
रामदयाल पाण्डेय

पिकी पुकारती रही, पुकारते धरा-गगन;
मगर कहीं रुके नहीं वसन्त के चपल चरण।

असंख्य काँपते नयन लिये विपिन हुआ विकल;
असंख्य बाहु हैं विकल, कि प्राण हैं रहे मचल;
असंख्य कंठ खोलकर 'कुहू कुहू' पुकारती;
वियोगिनी वसन्त की...

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