अप्रतिम कविताएँ पाने
हाइकु
मुठ्ठी में कैद
धूप फिसल गयी
लड़की हँसी
- अनूप भार्गव
Anoop Bhargava
email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 21 Sep 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Oct 2021

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'हर मकान बूढ़ा होता'
कुमार रवीन्द्र


साधो, सच है
जैसे मानुष
धीरे-धीरे हर मकान भी बूढ़ा होता

देह घरों की थक जाती है
बस जाता भीतर अँधियारा
उसके हिरदय नेह-सिंधु जो
वह भी हो जाता है खारा

घर में
जो देवा बसता है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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'अधूरी'
प्रिया एन. अइयर


हर घर में दबी आवाज़ होती है
एक अनसुनी सी
रात में खनखती चूड़ियों की
इक सिसकी सी
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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