यूँ ही ...
तुम समन्दर का किनारा हो
मैं एक प्यासी लहर की तरह
तुम्हे चूमने के लिए उठता हूँ
तुम तो चट्टान की तरह
वैसी ही खड़ी रहती हो
मैं ही हर बार तुम्हे
बस छू के लौट जाता हूँ
- अनूप भार्गव
Anoop Bhargava
email: [email protected]
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अनूप भार्गव
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'मित्र सहेजो'
कुमार रवीन्द्र


मित्र सहेजो
हम जंगल से धूप-छाँव लेकर आये हैं

पगडण्डी पर वे बैठी थीं पाँव पसारे
पेड़ों ने थे फगुनाहट के बोल उचारे

उन्हें याद थे
ऋषियों ने जो मंत्र सूर्यकुल के गाये हैं
..

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'तैर रहा इतिहास नदी में'
कुमार रवीन्द्र


तैर रहा है
यहाँ, बंधु, इतिहास नदी में

खँडहर कोट-कँगूरे तिरते उधर मगध के
इधर लहर लेकर आई है अक़्स अवध के
काँप रही है
उनकी बूढ़ी साँस नदी में ..

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शुक्रवार 25 जनवरी को

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