अप्रतिम कविताएँ
सीप में मोती
मैंने अनजाने ही भीगे बादलों से पूछा
छुआ तुमने क्या
उस सीप में मोती को
बादलों ने नकारा उसे
बोले दुहरी है अनुभूति मेरी
बहुत सजल है सीप का मोती
मेरा सोपान नहीं
स्वप्न नहीं
अपने में एक गिरह लिए रहता है
समुद्र का शोर लिए रहता है

मैं छू भी लूँ उसको
तो भी वो अपने अस्तित्व लिए रहता है
कथन हो या कहानी वो
एक पात्र बना रहता है
अँजुलि भर पी भी लूँ
तो भी वो एक मरुस्थल बना रहता है
यह वो एकाकी है जो मुझे छूती है
मुझे नकार मुझे ही अपनाती है
सीप में मोती बन स्वाति नक्षत्र को दमका जाती है
मेरा ही पात्र बन मुझे ही अँगुलि भर पानी पिला जाती है
इसी गरिमा को अपना मुझे ही छू जाती है।
मैं यही अनुभूति लिए
नकारते हुए अपनाते हुए
भीगते हुए बहते हुए
सीप में ही मोती बन जाती हूँ।
- रजनी भार्गव
Rajni Bhargava
email: [email protected]
Rajni Bhargava
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विषय:
प्रकृति (41)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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