अप्रतिम कविताएँ

कुछ नहीं चाहा
कुछ नहीं चाहा है तुमसे
पर तुम एक खूबसूरत मोड़ हो
जहाँ ठहरने को मन करता है
कुछ पल चुनने का मन करता है
तुम्हे पकड़ पास बिठाने को मन करता है

कुछ नहीं चाहा है तुमसे
तुम एक लगाव हो
जिसे कुछ सुनाने को मन करता है
कुछ भी कहने को मन करता है
तुम्हे पुकार बस हाँ या ना कहने को मन करता है
कुछ नहीं चाहा है तुमसे
तुम एक पर खूबसूरत मोड़ हो
जहाँ ठहरने को मन करता है।
- रजनी भार्गव
काव्यपाठ: नूपुर अशोक
Rajni Bhargava
email: [email protected]
विषय:
प्रेम (63)

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सुहैर हम्माद


नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
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जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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