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नदी समंदर होना चाहती है
आहत सी सभ्यता के द्वार पे
कब तक निहारे आँगन
बंधन तोड़ जाना चाहती है
युगों का बोझ लिये बहती रही
थकने लगी है शायद
कुछ विश्राम पाना चाहती है
अथाह जल-राशि की जो स्वामिनी
क्षितिज पार होती हुई
अंतरिक्ष समाना चाहती है
ओह पायी है मधुरता कितनी
न आँसू भी धो सके
ये नमकीन होना चाहती है
बंधन में छटपटाती है बहुत
पत्थरों को तराशती
अब विस्तार पाना चाहती है
बांटती रही है जग को जीवन
भीगी-भीगी सी नदी
समंदर हो जाना चाहती है
-
शिखा गुप्ता
Shikha Gupta
Email :
[email protected]
विषय:
स्त्री (19)
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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
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