प्रेम गाथा
एक था काले मुँह का बंदर
वह बंदर था बड़ा सिकंदर।

उसकी दोस्त थी एक छुछुंदर
वह थी चांद सरीखी सुंदर।

दोनो गये बाग़ के अंदर
उन्होंने खाया एक चुकंदर।

वहाँ खड़ा था एक मुछंदर
वह था पूरा मस्त कलंदर।

उसने मारा ऐसा मंतर
बाग़ बन गया एक समुंदर।

उसमें आया बड़ा बवंडर
पानी में बह गया मुछंदर।

एक डाल पर लटका बंदर
बंदर पर चढ़ गयी छ्छुंदर।

इतनी ज़ोर से कूदा बंदर
वे दोनो आ गये जलंधर।

ता-तेइ करके नाचा बदंर
कथक करने लगी छछुंदर।

ऐसे दोनो दोस्त धुरंधर
हँसते गाते रहे निरंतर।
- विनोद तिवारी
Dr. Vinod Tewary
Email : [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 1 Jan 2013. काव्यालय पर प्रकाशित: 20 Apr 2018

***
विनोद तिवारी
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 ऐसी लगती हो
 जीवन दीप
 दुर्गा वन्दना
 प्यार का नाता
 प्रवासी गीत
 प्रेम गाथा
 मेरी कविता
 मेरे मधुवन
 यादगारों के साये
 हिन्दोस्तां हमारा
इस महीने : साल के अन्त में
'सत्यं शिवं सुन्दरम्'
सुधीर कुमार शर्मा


वसुधा के कण-कण तृण-तृण में
सूरज चंदा नीलगगन में
नदिया पर्वत और पवन में
कोटि-कोटि जन के तन-मन में
सिमटी उस विराट शक्ति को
मन-मंदिर में सदा बसाओ
शिव से ही कुछ सुन्दर उपजाओ
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 20 दिसम्बर को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website