इतनी बार भरी गई है
दुःख, तकलीफ और त्याग की चाबी
कि माँ बन चुकी है एक खिलौना
घूम रही है गोल-गोल
रोटी की तरह गोल-गोल
तुलसी चौरे पर गोल-गोल
किचन-ऑफिस में गोल-गोल
बन्द करो अब चाबी भरना
सो जाओ माँ अब तो दो पल
पसर कर, सारी दुनिया भूलकर
बिना किसी अपराध बोध के।
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।