आज नदी बिल्कुल उदास थी -- केदारनाथ अग्रवाल
'धत्'
दिव्या माथुर

सीधा
मेरी आँखों में
बेधड़क घूरती
बिल्ली सा
वह एक
निडर ख़्याल तेरा
टाँगों के बीच
पूँछ दबा
मेरी एक धत् से
भाग लिया।
...

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'हाइकु'
अनूप भार्गव

मुठ्ठी में कैद
धूप फिसल गयी
लड़की हँसी ...

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'बूँदें'
कुसुम जैन

बरसती हैं बूँदें
झूमते हैं पत्ते

पत्ता-पत्ता जी रहा है
पल पल को

आने वाले कल से बेख़बर
...

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