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अस्तित्व
मैनें कई बार
कोशिश की है
तुम से दूर जानें की,
लेकिन
मीलों चलनें के बाद
जब मुड़ कर देखता हूँ
तो तुम्हें
उतना ही करीब पाता
हूँ |
तुम्हारे इर्द
गिर्द
वृत्त की
परिधि बन कर रह गया
हूँ मैं ।
-
अनूप भार्गव
विषय:
प्रेम (63)
गणित विज्ञान (9)
रिश्ते (18)
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अस्तित्व
प्रतीक्षा
यूँ ही ...
रिश्ते
हाइकु
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार
स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।
हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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