चाय पी जाती है
धीरे-धीरे
घूँट-घूँट ,
जीवन की तरह –
पल-पल
हर दिन
भरपूर !
अंत में
थोड़ी रह जाती है
कप के तले में ,
जीवन में भी
रह ही जाता है
कुछ,
भूल जाने लायक !
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।