तूलिका से बिखरते हुये
भयावह,
किन्तु
सौन्दर्य लिये सत्य का
मानव की
रक्त की
पिपासा के प्रतीक
ये रंग
कितने निरीह,
कितने चुप,
किन्तु कितने वाचाल।
कब आयेगा
सपनो का सावन
जो आस्था के रंगो को
धो कर निखार दे।
कदाचित कभी नहीं।
किन्तु फिर भी
विश्वास है,
एक दिन
किसी
मानवी की आँखों से
बहेगी
ममता की धारा,
उसमें बह जायेंगे
गुनाहों के दाग़।
उस दिन
संगीत के स्वरों में,
गीतों के बोलों मे,
मुखरित होगा
जीवन का संदेश
और तूलिका से
सृजित होगा
नूतन, नवल, इन्द्रधनुष।
हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।
माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
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