काव्य शिल्प में शब्द संयोजन का मेरा एक अनुभव

वाणी मुरारका


"आज यूनिफॉर्म आयरन नहीं हो सका? कोई बात नहीं। तुम यहाँ खड़ी हो जाओ सीता। कपड़े ढक जाएँगे, पर चहरा स्पष्ट नज़र आएगा। राधिका तुम मॉनिटर हो, सामने की पंक्ति मे आ जाओ। लम्बी हो इसलिए तुम्हे बैठना होगा।"

क्लास फोटो के पहले सारे बच्चों के लिए ठीक ठीक जगह तय करना बड़ा पेचीदा काम है। अक्सर कविता की एक पंक्ति मे भी कौन से शब्द कहाँ रखे जाएं, यह संयोजन या तो पंक्ति को सरसता प्रदान करती है, या एक चुभते कंकड़ का आभास छोड़ जाती है। छन्द मात्रा सही हो, वही चार-पाँच शब्द, पर किसे कौन सी कुर्सी मिले जिससे कि पंक्ति कानों को सहला जाए - यह तय करने में शब्दों में फेर बदल करना जरूरी होता है। इस आधी अधूरी रचना में एक पंक्ति ने ऐसे ही मुझे तंग किया, एक छोटे से अस्पष्ट कंकड़ का आभास होता रहा -


यह नियम है - शाम ढलती है।
दु:ख के आँचल का लहराना
यह भी मन का अटल नियम है।

ऐसे मत हो -
दिन तो भाए पर, रात ढले ना सहन करो।
अपने हथियार रख दो सारे
पोषण लेकर आई रात,
कुछ पल यह भी ग्रहण करो।

वह कष्टदायक पंक्ति थी
अपने हथियार रख दो सारे

बहुत देर तक समझ में नहीं आया, पढ़ने में कहाँ अड़चन आ रही है। फिर दिखा - "हथियार" का र और "रख" का र मिल रहें हैं और पढ़ने में दोनों शब्द का स्पष्ट उच्चारण नहीं हो पा रहा है।

तो दूसरी बार पंक्ति यह बनी,
अपने हथियार सारे रख दो

अब "हथियार" और "रख" अलग अलग हो गए, पढ़ते वक्त कानों को कुछ राहत मिली, पर अब "सारे" और "रख" पास पास थे - रे और र। र और र से तो यह बेहतर था फिर भी पढ़ते वक्त जीभ पूरी तरह से खुश नहीं थी।

फिर काव्य की देवी ने तीसरा रूप धरा
रख दो अपने हथियार सारे

इस संयोजन में कुछ तो आकर्षक है - पढ़ते वक्त स्वत: ही हथियार के "या" पर ज़ोर पड़ रहा है जिससे कि शायद अभिव्यक्ति कुछ सशक्त हुई है। अब पंक्ति को अपने पड़ोसियों के संग पढ़ते हैं -
दिन तो भाए पर, रात ढले ना सहन करो।
रख दो अपने हथियार सारे
पोषण लेकर आई रात,

फिर कुछ खटक रहा है। बात यह है कि हमारी पंक्ति में 2 2 मात्रा के संयोजन में हथियार का र बेचारा चिपट गया है।

यहाँ दो बातें महत्वपूर्ण हैं -

  1. जब विषम मात्राओं की पंक्ति हो, जैसे 15, 17, 19 - तो आखरी अक्षर अकेले एक मात्रा का बचे तो बेहतर है। यहाँ 17 मात्रा की पंक्ति का अन्त 2 मात्रा से हो रहा है - "सारे" के "रे" से।
  2. पंक्ति के बीच में विषम मात्रा के शब्द को जितनी शीघ्रता से पास के शब्द से एक मात्रा मिल जाए, उतना बेहतर है - जिससे कि विषम सम हो सके। जैसे कि "प्यार नहीं" और "नहीं प्यार" के बीच "प्यार नहीं" में ज्यादा लय है।

तो इस तरह से आखिरकार पंक्ति ने रूप लिया -
रख दो अपने सारे हथियार

अगली पंक्ति के संग देखें तो
रख दो अपने सारे हथियार
पोषण लेकर आई रात

अब हथियार का यार और रात दोनों 2+1 से समाप्त हो रहे हैं तो कानों को कुछ और सुकून मिल रहा है - और रचना ने यह रूप लिया

यह नियम है - शाम ढलती है।
दु:ख के आँचल का लहराना
यह भी मन का अटल नियम है।

ऐसे मत हो -
दिन तो भाए पर, रात ढले ना सहन करो।
रख दो अपने सारे हथियार -
पोषण लेकर आई रात,
कुछ पल यह भी ग्रहण करो।

इस लेख में मात्राओं के चित्र गीत गतिरूप के सहयोग से बनाए गए हैं। गीत गतिरूप एक सॉफ़्टवेयर है जो काव्य-शिल्प संवारने में कवि की मदद करता है। कविता में शब्द संयोजन के आपके अनुभव और विचार भी हमारे संग नीचे कमेन्ट्स में साझा करें।

22 सितम्बर 2017


Topic:
Craft of Poetry (15)
***
Donate
A peaceful house of the beauty and solace of Hindi poetry, free from the noise of advertisements... to keep Kaavyaalaya like this, please donate.

₹ 500
₹ 250
Another Amount
Vani Murarka
's other poems on Kaavyaalaya

 Agar Suno To
 Adhooree Saadhanaa
 Gahraa Aangan
 Chup See Lagee Hai
 Jal Kar De
 Desh Kee Naagarik
 Dheere-dheere
 Shahar Kee Diwali Par Amaavas Kaa Aahvaan
This Month :
'Aath Varsh'
Jaya Prasad


rimajhim saavan barasaa jab
ank tumhen bhar laayee thee
kuchh khoyee-see, kuchh aboojh
kuchh khush, kuchh ghabaraaee thee

gol-maTol, chaar pair par
ghar-aa(n)gan sab naap liyaa
nanhe vaaman jaise tumane
..

Read more here...
This Month :
'Yun Pati Kee Maa Bante Jaanaa'
Kiran Sipani


har pal veeDiyo dikhaakar phusalaate jaanaa
aur yoona(n) kauron kaa halak se utarate jaanaa ‌
kabhee vaayalin pakaD़naa, kabhee jhaTak ke rakh denaa
rooThanaa- machalanaa- n nahaane kee j़id karate rahanaa
kaatar najaron se mere hukm ko sirph takate rahanaa
..

Read more here...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी कविता | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख । हमारा परिचय | सम्पर्क करें

a  MANASKRITI  website