अप्रतिम कविताएँ
365 सिक्के

तीन सौ पैंसठ
सिक्के थे गुल्लक में
कुछ से मुस्कुराहटें खरीदीं
कुछ से दर्द,
कुछ से राहतें,
कुछ खर्चे खींचातानी में
कुछ रूठने मनाने में,
कुछ दे दिए दूसरों की
मुस्कान के लिए,
कुछ खोटे सिक्के
भी थे उसमें,
बाँध के रख लिया उन्हें
आँचल के कोने में
बीते साल की निशानी की
पहचान के लिए।
- पारुल 'पंखुरी'
काव्यपाठ: पारुल 'पंखुरी'
Parul 'Pankhuri'
Email : [email protected]
विषय:
बीता समय (18)
समय (7)

काव्यालय को प्राप्त: 2 Feb 2025. काव्यालय पर प्रकाशित: 19 Dec 2025

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