तीन सौ पैंसठ
सिक्के थे गुल्लक में
कुछ से मुस्कुराहटें खरीदीं
कुछ से दर्द,
कुछ से राहतें,
कुछ खर्चे खींचातानी में
कुछ रूठने मनाने में,
कुछ दे दिए दूसरों की
मुस्कान के लिए,
कुछ खोटे सिक्के
भी थे उसमें,
बाँध के रख लिया उन्हें
आँचल के कोने में
बीते साल की निशानी की
पहचान के लिए।
तुम्हारे पास बहुत से रंग हैं
दोस्ती, प्यार, इकरार,
उम्मीदों और खुशियों के।
सपनों का तो रंग-बिरंगा
चंदोवा ही तान दिया है तुमने।
निश्छल मुस्कान का ...
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