गुनाह का गीत
अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
      महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
      महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

   तुम्हारा मन अगर सींचूँ
   गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
   तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचल
उसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटल
किसी के होठ पर झुक जायँ कच्चे नैन के बादल
      महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
      महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

किसी की गोद में सिर धर
घटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाए
धड़कते वक्ष पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?
   न हो यह वासना तो ज़िन्दगी की माप कैसे हो?
   किसी के रूप का सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?
   नसों का रेशमी तूफान मुझ पर शाप कैसे हो?

   किसी की साँस मैं चुन दूँ
   किसी के होठ पर बुन दूँ अगर अंगूर की पर्तें
   प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें
यहाँ तो हर कदम पर स्वर्ग की पगडण्डियाँ घूमीं
अगर मैंने किसी की मदभरी अँगड़ाइयाँ चूमीं
अगर मैंने किसी की साँस की पुरवाइयाँ चूमीं
      महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
      महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
- धर्मवीर भारती
धर्मवीर भारती की काव्य संकलन "ठण्डा लोहा" से ...

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धर्मवीर भारती
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'भावुकता और पवित्रता'
रवीन्द्रनाथ ठाकुर


भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से, भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।

प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा बन जाती है। मनुष्य अन्यान्य रस-लाभ के लिए जिस तरह विविध प्रकार के आयोजन करता है, लोगों को नियुक्त करता है, रुपया खर्च करता है उसी तरह उपासना-रस के नशे के लिए भी वह तरह-तरह के आयोजन करता है। रसोद्रेक के लिए उचित लोगों का संग्रह करके उचित रूप से वक्तृताओं की व्यवस्था की जाती है। भगवत्प्रेम का रस नियमित रूप से मिलता रहे, इस विचार से तरह-तरह की दुकानें खोली जाती है। ..

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शुक्रवार 26 अप्रैल को

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