गुनाह का गीत
अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
      महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
      महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

   तुम्हारा मन अगर सींचूँ
   गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
   तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचल
उसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटल
किसी के होठ पर झुक जायँ कच्चे नैन के बादल
      महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
      महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

किसी की गोद में सिर धर
घटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाए
धड़कते वक्ष पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?
   न हो यह वासना तो ज़िन्दगी की माप कैसे हो?
   किसी के रूप का सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?
   नसों का रेशमी तूफान मुझ पर शाप कैसे हो?

   किसी की साँस मैं चुन दूँ
   किसी के होठ पर बुन दूँ अगर अंगूर की पर्तें
   प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें
यहाँ तो हर कदम पर स्वर्ग की पगडण्डियाँ घूमीं
अगर मैंने किसी की मदभरी अँगड़ाइयाँ चूमीं
अगर मैंने किसी की साँस की पुरवाइयाँ चूमीं
      महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
      महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
- धर्मवीर भारती
धर्मवीर भारती की काव्य संकलन "ठण्डा लोहा" से ...

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धर्मवीर भारती
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इस महीने
'कारवाँ गुज़र गया'
गोपालदास नीरज


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई, ..
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'मेरे सम्बन्धीजन'
परमहंस योगानन्द


समाधि के विस्तृत महाकक्ष में,
जो लाखों झिलमिलाते प्रकाशों से दीप्त,
और बर्फीले बादल की चित्र यवनिका से शोभायमान है,
मैंने गुप्त रूप से अपने सभी - दीन-हीन, गर्वित सम्बन्धीजनों को देखा।

महान प्रीतिभोज संगीत से उमड़ा,
ओम का नगाड़ा बजा अपनी ताल में।
अतिथि नाना प्रकार के सजे,
कुछ साधारण, कुछ शानदार पोशाकों में। ..
पूरी रचना यहाँ पढें...
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शुक्रवार 27 जुलाई को

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