प्रीति करि काहु सुख न लह्यो
प्रीति करि काहु सुख न लह्यो।
प्रीति पतंग करी दीपक सों, आपै प्रान दह्यो॥
अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों, संपति हाथ गह्यो।
सारँग प्रीति करी जो नाद सों, सन्मुख बान सह्यो॥
हम जो प्रीति करि माधव सों, चलत न कछु कह्यो।
'सूरदास' प्रभु बिनु दुख दूनो, नैननि नीर बह्यो॥
- सूरदास
Ref: Swantah Sukhaaya
Pub: National Publishing House, 23 Dariyagunj, New Delhi - 110002

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सूरदास
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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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~ विनोद तिवारी| ग़ज़ल "बेकली महसूस हो तो" के कुछ शेर, संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

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