अप्रतिम कविताएँ
लो दिन बीता, लो रात गई
लो दिन बीता, लो रात गई,
सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा,
डूबा, संध्या आई, छाई,
     सौ संध्या-सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था,
     दिन में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।

धीमे-धीमे तारे निकले,
धीरे-धीरे नभ में फैले,
     सौ रजनी-सी वह रजनी थी
क्यों संध्या को यह सोचा था,
     निशि में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।

चिड़ियाँ चहकीं, कलियाँ महकी,
पूरब से फिर सूरज निकला,
     जैसे होती थी सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था,
     होगी प्रातः कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई,
- हरिवंशराय बच्चन
Ref: Sopaan
Pub: B.P.Thakur
Leader Press, Allahabad
विषय:
समय (7)
आम दिन (4)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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