अप्रतिम कविताएँ

जीवन की करो गिनती
इससे पहले कि अँधेरा पोत दे काला रंग
सफेद रोशनी पर
फैला जो है उजास
उसकी बातें करो
अँधेरे की बूँद को समुद्र मत बनाओ

इससे पहले कि मृत्यु अपने को बदल दे शोर में
गीत गाओ, सुनाओ
जीवन की रागिनी गुनगुना रही है
श्रवण के सारे द्वार खोलो
कैनवास भरा है सुर से, संगीत से
मौत के छीटों को बड़ा मत बनाओ

विषाद का आनन्द लेने वाले
जिजीविषा पर कर दें हमला
इससे पहले
उलट दो गणित को
जीवन की करो गिनती
रिक्ति को सम्पूर्ण पर मत बिठाओ।
- प्रकाश देवकुलिश
काव्यपाठ: प्रकाश देवकुलिश
विषय:
जीवन (37)
प्रेम (63)
प्रेरणा (20)
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय को प्राप्त: 14 Oct 2022. काव्यालय पर प्रकाशित: 23 Dec 2022

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
प्रकाश देवकुलिश
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 जीवन की करो गिनती
 दरख़्त-सी कविता
 प्रणाम
 वो हवा वहीं ठहरी है
इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website