अप्रतिम कविताएँ
सूर्य
सूर्य, तुम्हें देखते-देखते
मैं वृद्ध हो गया।

लोग कहते हैं,
मैंने तुम्हारी किरणें पी हैं,
तुम्हारी आग को
पास बैठकर तापा है।

और अफ़वाह यह भी है
कि मैं बाहर से बली
और भीतर से समृद्ध हो गया।

मगर राज़ की बात कहूँ,
तो तुम्हें कलंक लगेगा।

ताकत मुझे अब तुमसे नहीं,
अन्धकार से मिलती है।
जहाँ तक तुम्हारी किरणें
नहीं पहुँचतीं,
उस गुफा के हाहाकार से मिलती है।
- रामधारी सिंह 'दिनकर'
दिनकर के संकलन "हारे को हरिनाम" से
विषय:
अंधेरा (4)

काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Nov 2021

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..

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महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा ..

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