नदी का बहना मुझमें हो
मेरी कोशिश है कि
नदी का बहना मुझमें हो।
तट से सटे कछार घने हों
जगह जगह पर घाट बने हों
टीलों पर मंदिर हों जिनमें
स्वर के विविध वितान तने हों
मीड़ मूर्च्छनाओं का
उठना गिरना मुझमें हो।
जो भी प्यास पकड़ ले कगरी
भर ले जाये खाली गगरी
छूकर तीर उदास न लौटें
हिरन कि गाय बाघ या बकरी
मच्छ मगर घडियाल
सभी का रहना मुझमें हो।
मैं न रुकूँ संग्रह के घर मे
धार रहे मेरे तेवर में
मेरा बदन काट कर नहरे
पानी ले जायें ऊसर मे
जहाँ कहीं हो बंजरपन का
मरना मुझमें हो।
मीड़: एक से दूसरे स्वर पर जाते समय बीच की श्रुतियों को छूते हुए जाना मूर्छना: सात स्वरों का आरोह अवरोह कगरी: ऊँचा किनारा ऊसर: बंजर भूमि
काव्यालय पर प्रकाशित: 18 Jan 2018