अप्रतिम कविताएँ
नदी का बहना मुझमें हो

मेरी कोशिश है कि
नदी का बहना मुझमें हो।

तट से सटे कछार घने हों
जगह जगह पर घाट बने हों
टीलों पर मंदिर हों जिनमें
स्वर के विविध वितान तने हों

मीड़ मूर्च्छनाओं का
उठना गिरना मुझमें हो।

जो भी प्यास पकड़ ले कगरी
भर ले जाये खाली गगरी
छूकर तीर उदास न लौटें
हिरन कि गाय बाघ या बकरी

मच्छ मगर घडियाल
सभी का रहना मुझमें हो।

मैं न रुकूँ संग्रह के घर मे
धार रहे मेरे तेवर में
मेरा बदन काट कर नहरे
पानी ले जायें ऊसर मे

जहाँ कहीं हो बंजरपन का
मरना मुझमें हो।
- शिव बहादुर सिंह भदौरिया
काव्यपाठ: शंकर मुनि राय
मीड़: एक से दूसरे स्वर पर जाते समय बीच की श्रुतियों को छूते हुए जाना मूर्छना: सात स्वरों का आरोह अवरोह कगरी: ऊँचा किनारा ऊसर: बंजर भूमि
विषय:
संकल्प (14)
अन्तर्मन (14)

काव्यालय पर प्रकाशित: 18 Jan 2018

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 जीकर देख लिया
 नदी का बहना मुझमें हो
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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