अप्रतिम कविताएँ
भोर का गीत
भोर की लाली हृदय में राग चुप-चुप भर गयी!

     जब गिरी तन पर नवल पहली किरन
     हो गया अनजान चंचल मन-हिरन
     प्रीत की भोली उमंगों को लिए
     लाज की गद-गद तरंगों को लिए
प्रात की शीतल हवा आ, अंग सुरभित कर गयी!

     प्रिय अरुण पा जब कमलिनी खिल गयी
     स्वर्ग की सौगात मानों मिल गयी,
     झूमती डालें पहन नव आभरण,
     हर्ष-पुलकित किस तरह वातावरण,
भर सुनहरा रंग, ऊषा कर गयी वसुधा नयी!
- डा. महेन्द्र भटनागर
विषय:
प्रकृति (41)
उषा काल (5)

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अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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धर्मवीर भारती


अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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