अप्रतिम कविताएँ
एक रात
अँधियारे जीवन-नभ में
बिजुरी-चमक गयी तुम!

सावन झूला झूला जब
बाँहों में रमक गयीं तुम!

कजली बाहर गूँजी जब
श्रुति-स्वर-सी गमक गयीं तुम!

महकी गंध त्रियामा जब
पायल-झमक गयीं तुम!

तुलसी-चौरे पर आकर
अलबेली छमक गयीं तुम!

सूने घर-आँगन में आ
दीपक-सी दमक गयीं तुम!
- डा. महेन्द्र भटनागर
विषय:
प्रेम (63)

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'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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