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साँस की
यात्राओं को दो
वेणुवन की ठौर
अभी बाकी
है अलौकिकता
हमारे शंख में भी
और बाकी हैं उड़ानें
सुनो, बूढ़े पंख में भी
इन थकी
पिछली लयों पर भी
करो तुम गौर
-
कुमार रवीन्द्र
विषय:
आशा विश्वास (19)
काव्यालय को प्राप्त: 6 Jan 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 21 Dec 2017
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..
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..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!
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..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
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