अप्रतिम कविताएँ
अभी होने दो समय को
अभी होने दो
समय को
गीत फिर कुछ और

वक्त के बूढ़े कैलेंडर को
हटा दो
नया टाँगों
वर्ष की पहली सुबह से
बाँसुरी की धुनें माँगो

सुनो निश्चित
आम्रवन में
आएगा फिर बौर

बर्फ की घटनाएँ
थोड़ी देर की हैं
धूप होंगी
खुशबुओं के टापुओं पर
टिकेगी फिर परी-डोंगी

साँस की
यात्राओं को दो
वेणुवन की ठौर

अभी बाकी
है अलौकिकता
हमारे शंख में भी
और बाकी हैं उड़ानें
सुनो, बूढ़े पंख में भी

इन थकी
पिछली लयों पर भी
करो तुम गौर
- कुमार रवीन्द्र
विषय:
आशा विश्वास (19)

काव्यालय को प्राप्त: 6 Jan 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 21 Dec 2017

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'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
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कुछ खुश, कुछ घबराई थी

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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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