अप्रतिम कविताएँ
बक्सों में यादें
बक्सों में बन्द हैं यादें
       हर कपड़ा एक याद है
       जिसे तुम्हारे हाथों ने तह किया था
धोबी ने धोते समय इन को रगड़ा था
       पीटा था
मैल कट गया पर ये न कटीं
यह और अन्दर चली गयीं
हम ने निर्मम होकर इन्हें उतार दिया
       इन्होंने कुछ नहीं कहा
पर हर बार
       ये हमारा कुछ अंश ले गयीं
             जिसे हम जान न सके
त्वचा से इन का जो सम्बन्ध है वह रक्त तक है
       रक्त का सारा उबाल इन्होंने सहा है
इन्हें खोल कर देखो
       इन में हमारे खून की खुशबू ज़रूर होगी
अभी ये मौन है
       पर इन की एक-एक परत में जो मन छिपा है
             वह हमारे जाने के बाद बोलेगा
यादें आदमी के बीत जाने के बाद ही बोलती हैं
बक्सों में बन्द रहने दो इन्हें
       जब पूरी फुरसत हो तब देखना
इन का वार्तालाप बड़ा ईर्ष्यालू है
       कुछ और नहीं करने देगा।
- कुमार रवीन्द्र
Ref: Naya Prateek, June,1976
विषय:
बीता समय (18)

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..

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

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