Holi Kee Shaam
holee kee shaam saḌaken veeraan
jaise guzar gayaa ho kaaravaa(n)
chhoḌ gayaa kuchh apanee nishaaniyaa(n) --
bikhare hue rang, phooTe gubbaare,
bichhe hue peepal ke patte,
Daal se TooTe champaa ke phool...
ikkaa-dukkaa kishoron kee Toliyaa(n),
lauTatee gharon ko,
range hue kapaḌe aur pute hue chehare
bayaa(n) kar rahe hain ye daastaa(n) --
abhee abhee guzar gayaa yahaa(n) se
ra(n)gon kaa ek kaaravaa(n)
- Geeta Malhotra
Geeta Malhotra
Email: [email protected]

प्राप्त: 18 Mar 2014. प्रकाशित: 22 Mar 2019

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Geeta Malhotra
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'भावुकता और पवित्रता'
रवीन्द्रनाथ ठाकुर


भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से, भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।

प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा बन जाती है। मनुष्य अन्यान्य रस-लाभ के लिए जिस तरह विविध प्रकार के आयोजन करता है, लोगों को नियुक्त करता है, रुपया खर्च करता है उसी तरह उपासना-रस के नशे के लिए भी वह तरह-तरह के आयोजन करता है। रसोद्रेक के लिए उचित लोगों का संग्रह करके उचित रूप से वक्तृताओं की व्यवस्था की जाती है। भगवत्प्रेम का रस नियमित रूप से मिलता रहे, इस विचार से तरह-तरह की दुकानें खोली जाती है। ..

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