अप्रतिम कविताएँ
एक रात
अँधियारे जीवन-नभ में
बिजुरी-चमक गयी तुम!

सावन झूला झूला जब
बाँहों में रमक गयीं तुम!

कजली बाहर गूँजी जब
श्रुति-स्वर-सी गमक गयीं तुम!

महकी गंध त्रियामा जब
पायल-झमक गयीं तुम!

तुलसी-चौरे पर आकर
अलबेली छमक गयीं तुम!

सूने घर-आँगन में आ
दीपक-सी दमक गयीं तुम!
- डा. महेन्द्र भटनागर
विषय:
प्रेम (63)

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दोस्ती, प्यार, इकरार,
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निश्छल मुस्कान का ... ..

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आह्लाद में डूबे रंग खिलखिला रहे हैं

इतने रंग हैं
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आज तितलियों के लिए

गले मिल रहे हैं रंग

जब मिलता है गले एक रंग
दूसरे रंग से
बदल जाता है ...
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