अप्रतिम कविताएँ
तू ज़िंदा है
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये ग़म के और चार दिन सितम के और चार दिन
ये दिन भी जाएँगे गुज़र गुज़र गए हज़ार दिन

कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र।
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

हमारे कारवाँ का मंज़िलों को इंतज़ार है
ये आँधियों की बिजलियों की पीठ पर सवार है

जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

हज़ार रूप धर के आई रात तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर

नई सुबह के संग सदा मिली तुझे नई उमर।
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।
- शैलेंद्र
विषय:
आशा विश्वास (19)

काव्यालय को प्राप्त: 24 Jul 2026. काव्यालय पर प्रकाशित: 31 Jul 2026

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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