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ठहराव
आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
चलते रहें बस राह पर,
मंज़िल से बेफ़िक्र होकर...
शोर में भी एक ख़ामोशी,
जैसे गहरा कोई मर्म है।
न जीत का कोई जश्न हो,
न हार का कोई डर हो,
बस बहते रहें उस नदी की तरह,
जिसका समंदर में ही घर हो।
-
राहुल सिंह 'राहु'
विषय:
अध्यात्म दर्शन (38)
काव्यालय को प्राप्त: 30 Jun 2026. काव्यालय पर प्रकाशित: 28 Aug 2026
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इस महीने :
'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे
छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।
बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने
ईंटों की दीवा ..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
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